बाजार की वर्तमान स्थिति और कीमतों में सुधार का सिलसिला
पिछले दो सप्ताह के दौरान देश के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्यों में कीमतों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। वर्तमान समय में सोयाबीन के दाम धीरे-धीरे सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी के करीब पहुंच रहे हैं। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के विभिन्न प्रसंस्करण संयंत्रों (Processing Plants) में सोयाबीन की खरीद दर इक्यावन सौ से बावन सौ रुपये प्रति क्विंटल के बीच दर्ज की जा रही है। हालांकि, स्थानीय कृषि मंडियों में किसानों को मिलने वाला वास्तविक भाव अब भी समर्थन मूल्य से थोड़ा पीछे है। मंडियों में अधिकतर सोयाबीन छियालीस सौ से अड़तालीस सौ रुपये के दायरे में बिक रहा है, जिसका सीधा अर्थ है कि प्लांट और मंडी के भाव में अभी भी तीन सौ से चार सौ रुपये का अंतर बना हुआ है।
कीमतों में मजबूती आने के पीछे के मुख्य कारण
सोयाबीन के बाजार में आई इस हालिया तेजी के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण उत्तरदायी हैं। इस वर्ष देश में सोयाबीन का कुल उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम रहने का अनुमान लगाया गया है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन एक सौ पांच से एक सौ दस लाख टन के आसपास रह सकता है, जबकि बाजार में चर्चा है कि वास्तविक उत्पादन इससे भी कम हो सकता है। इसके अलावा, पिछले साल का बचा हुआ स्टॉक यानी कैरी फॉरवर्ड स्टॉक भी इस बार नाममात्र का ही था। साथ ही, घरेलू स्तर पर सोयाबीन के तेल और सोया खली (DOC) की मांग में मजबूती देखी जा रही है और यूरोपीय देशों सहित पड़ोसी देशों में निर्यात की स्थिति भी संतोषजनक बनी हुई है।
सरकारी खरीद और भावांतर योजना का प्रभाव
बाजार भाव को स्थिर रखने में सरकारी हस्तक्षेप की बड़ी भूमिका रही है। मध्य प्रदेश में भावांतर योजना के माध्यम से किसान अपनी फसल बेच रहे हैं, जहाँ सरकार बाजार भाव और एमएसपी के बीच के अंतर का भुगतान सीधे किसानों को कर रही है। वहीं, महाराष्ट्र में राज्य सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सीधी खरीद की प्रक्रिया जारी है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में अब तक लगभग पांच लाख टन सोयाबीन की सरकारी खरीद की जा चुकी है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वर्ष कुल सरकारी खरीद सात से आठ लाख टन तक सीमित रह सकती है, क्योंकि जैसे-जैसे बाजार के भाव में सुधार होगा, किसान सरकारी केंद्रों के बजाय खुले बाजार में फसल बेचना अधिक पसंद करेंगे।
जनवरी और फरवरी के लिए क्या है विशेषज्ञों का अनुमान
किसानों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जनवरी के महीने में सोयाबीन का भाव पचपन सौ रुपये प्रति क्विंटल के स्तर तक पहुँच पाएगा। वर्तमान बाजार रुझानों का विश्लेषण करने पर यह संकेत मिलता है कि जनवरी में सोयाबीन के औसत भाव में सुधार तो जारी रहेगा, लेकिन पचपन सौ रुपये के जादुई आंकड़े को छूने की संभावना इस महीने थोड़ी कम नजर आती है। विश्लेषकों का मानना है कि जनवरी के अंत तक सोयाबीन का भाव पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पूरी तरह पार कर सकता है। वहीं, पचपन सौ रुपये या एमएसपी के पार जाने के लिए किसानों को फरवरी के पहले या दूसरे सप्ताह तक का इंतजार करना पड़ सकता है।
किसानों के लिए लाभकारी बिक्री रणनीति और सुझाव
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए किसानों को अपनी फसल की बिक्री के लिए सुनियोजित योजना बनाने की आवश्यकता है। यदि स्थानीय मंडियों और सरकारी समर्थन मूल्य के बीच का अंतर तीन सौ रुपये से अधिक है, तो किसानों को सरकारी खरीद केंद्रों पर पंजीकरण कराकर अपनी फसल बेचनी चाहिए। महाराष्ट्र में यह सरकारी खरीद की प्रक्रिया बारह फरवरी तक जारी रहेगी। यदि किसान खुले बाजार में बेचना चाहते हैं, तो उन्हें कम से कम पांच हजार रुपये के भाव का इंतजार करना चाहिए। जानकारों का कहना है कि आवक कम होने और मांग बढ़ने के कारण आने वाले समय में भाव और बेहतर होंगे, इसलिए जल्दबाजी में एमएसपी से बहुत नीचे फसल बेचना नुकसानदेह साबित हो सकता है।